चिपको आंदोलन क्या है एवं इसका प्रभाव :

दोस्तों,

चिपको आंदोलन की 26 मार्च को सालगिरह है और इसी के रेस्पेक्ट में गूगल भी अपना डूडल चिपको आंदोलन को डेडिकेट किया करता है ।

तो चलिए शुरू से जानते है की चिपको आंदोलन क्या है और इसके प्रभाव।

  • CHIPKO MOVEMENT IN HINDI

चिपको आंदोलन एक पर्यावरण प्रेमी आंदोलन था। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य वनो की कटाई को रोककर वन संरक्षण करना था। लेकिन इस आंदोलन का ये नाम चिपको कैसे पढ़ा .

दरअसल ये बात थी 1970 के दशक की , उत्तराखंड (तब उत्तरप्रदेश का पहले का भाग) जंहा हिमालयी घने जंगल और कई बड़े बड़े पेड़ पौधे पाए जाते है।  लेकिन सड़क निर्माण , पर्यटन और जल व्यवस्था हेतु यंहा के क्षेत्र के वनो की कटाई की जानी थी।
जब वनो की कटाई का कार्य आरम्भ हुआ तब वहां के पुरुष और मुखयतः  स्त्रियों  के द्वारा कटाई का विरोध किया गया।
जब वन अधिकारी और ठेकेदार उन बड़े बड़े पेड़ो को काटने के लिए आगे बढे , तभी वंहा की महिलाए  उन बड़े पेड़ो से चिपक गई और कहने लगी की पेड़ो की कटाई से पहले हमें काटिये।
ये चिपको आंदोलन पूर्णतयः गाँधी की अहिंसा विचारधारा से प्रेरित था।
  •  चिपको आंदोलन की शुरुआत और इतिहास 

वास्तविक रूप में इस आंदोलन की शुरुआत हुई थी 18 वी सदी में।  इस चिपको आंदोलन का इतिहास बहुत पुराना है जब राजस्थान के बिश्नोई समाज के लोगो ने पेड़ो से लिपट कर पेड़ो की कटाई का विरोध किया।

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  • CHIPKO MOVEMENT के सूत्रधार

बात है 1973 की , जब उत्तराखंड के चमोली जिले (पूर्व उत्तरप्रदेश का भाग) जो घना हिमालयी वन्य क्षेत्र है, की  घटना है , यंहा के रहवासी के जीवन यापन का मुख्य स्त्रोत मवेशी पालन , कृषि और पेड़ो की छाल , शहद और गोंद था।

जब विकास कार्यो के लिए और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सड़क निर्माण कार्य करना था।

वंहा के वन्य अधिकारी और ठेकेदार की नजरो में वे बड़े बड़े पेड़ रहे थे। तो उन लोगो ने बिच में आने वाले पेड़ो को काटना चाहा।

लेकिन अपनी जीविका को कटता देख वंहा रहवासियों से रहा नहीं गया। और सभी लोग मुख्यतयाः महिलाए पढ़ो से चिपक गई।  इस आंदोलन की सूत्रधार और जननी श्री मति गौरा देवी थी।

गौरा देवी ने वनो की कटाई के विरोध में कहा की :
                                   
                                     “पहले मुझे गोली मारो और फिर काट लो हमारा मायका
गौरा देवी के इसी उद्भोदन से वंहा की सारी महिलाए भी प्रेरणा से भर गई और इस आंदोलन से जुड़ गई।  अपनी जान की परवाह किए बगैर पेड़ो को बचाना इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य था।
गौरा देवी के अलावा इस आंदोलन के रचयिता श्री चंडी प्रसाद भट्ट थे जिन्होंने इस आंदोलन की शुरुआत इन्होने ही की थी और इसी चिपको आंदोलन को आगे ले जाने में श्री सुंदरलाल बहुगुणा का भी असीम योगदान था।
जब यह चिपको आंदोलन चल रहा था तो पेड़ो से चिपकी हुई महिलाओ पर बहुत अत्याचार हुआ, ठेकेदारों ने उन्हें जान से मारने की धमकी, गालिया दी और यंहा तक की उन महिलाओ के ऊपर थूका भी।
पर सभी महिलाए साहस के साथ डटी रही , अंत में सभी बड़े वन्य अधिकारी और ठेकेदारों को झुकना पड़ा और चिपको आंदोलन सफल रहा।
बाद में इस आंदोलन का परिणाम अन्य राज्यों पर भी देखने को मिला। चिपको आंदोलन के फलस्वरूप यह आंदोलन धीरे धीरे पूर्वी बिहार , पश्चिमी राजस्थान , दक्षिण कर्णाटक और मध्य भारत के विंध्य में फैल गया।
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1980 में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी ने हिमालयी वनो की कटाई पर 15 सालो तक की रोक लगा दी। इसका परिणाम यह रहा की केंद्र सरकार ने पर्यावरण मंत्रालय का गठन किया और वन संरक्षण अधिनियम बनाया।
1987 में इस आंदोलन को सम्यक जीविका पुरूस्कार (Right Livelihood Award) दिया गया।
दोस्तों आज भी हम कई जगह देखते है की विकास और शहरीकरण के नाम पर पेड़ो की अंधाधुंध कटाई की जा रही है। इंसान इस बात से भली भाती परिचित है की पेड़ो का हमारे जीवन क्या महत्व है।
अगर पेड़ नहीं होंगे तो वर्षा नहीं होगी , प्रदुषण बढ़ेगा , जीव जंतु नहीं रहेगे और घोर विनाशकारी आपदाओ का जन्म होगा। पेड़ो से ही हमें ऑक्सीजन मिलती है जो जीवन के लिए बहुपयोगी है। तो अगर विकास के नाम पर पेड़ो की कटाई की जा रही है तो नए पौधे भी लगाए जाए।
अगर इसी तरह पेड़ो की कटाई की गई तो, हम सभी लोगो को भयंकर आपदा और विपदाओं का सामना करने के लिए भी तैयार होना पड़ेगा।
हमारी भी कुछ जिम्मेदारियां बनती है की हम भी पेड़ो की कटाई को रोके , पेड़ नहीं होगा तो जीवन की कल्पना करना भी संभव न हो पायेगा। अगर आप भी कही पर पेड़ कटते देखे तो उसका कड़ा विरोध जरूर करे।
अपने आस पास पेड़ पौधे लगाए और हरा भरा हरियाली बना के रखे।
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