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HANUMAN AUR BHEEM | MAHABHARAT IN HINDI | PAURANIK KATHA

HANUMAN AUR BHEEM | MAHABHARAT IN HINDI | PAURANIK KATHA

जानिए कैसे हनुमान जी ने सौ हाथियों के बल वाले भीम के घमंड को किया चकनाचूर 


ये बात तब की है जब पांच पांडवो और द्रोपदी को वनवास ओर अज्ञातवास मिला हुआ था। सभी जंगल में भटक रहे थे।  एक बार द्रौपदी जंगल में बनाए अपने झोपड़ी नुमा आश्रम के बाहर बैठी हुई थी की अचानक एक दिव्य पुष्प कही से उड़कर आश्रम में आ पंहुचा।

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इस दिव्य पुष्प को देखकर द्रौपदी आश्चर्य चकित हो गई क्योकि वह पुष्प कोई साधारण पुष्प न होकर ब्रह्मा पुष्प था, जिसकी सुगंध काफी मोहने वाली थी। 

ओर पुष्प की चाह में द्रौपदी ने भीम को बुलाया और कहा की "यह पुष्प मुझे बहुत प्रिय है , मैं इस दिव्य पुष्प को 
अपने केश (बालो) में सजाना चाहती हूँ, लेकिन मुझे नहीं पता की ये पुष्प कहा से उड़कर आया है , आप तो भीम है क्या आप मेरे लिए ये पुष्प ला सकते है "

भीम द्रौपदी के इस आग्रह को मना ना कर पाया और बड़े भाई युधिष्ठिर की आज्ञा लेकर पुष्प की खोज में जंगल में आगे निकल जाता है।


रास्ते में कई बड़ी मुसीबते आयी , जंगली जानवर आये सभी को पछाड़ कर आगे निकल गए , बड़े-बड़े पहाड़ और जंगल को लांघ कर भीमसेन अपनी मौज में आगे बढ़ते गए।

जब भगवान् विष्णु ने देखा की भीम को बहुत ज्यादा अभिमान हो गया है , वह घमंड में चूर हो गया है , तो भगवान विष्णु ने भीम को सबक दिलाने हेतु एक युक्ति अपनाई , और अपने सेवक हनुमान को आदेश दिया। 

भीम अपने रास्ते में चला जा रहा था की उन्होंने देखा की एक कमजोर सा दिखने वाला वानर बिच रास्ते में लेटा हुआ है , उस वानर की पूछ भीम को आगे बढ़ने के मार्ग को अवरुद्ध कर रही थी। 

भीम ने कहा की "हे वानर , तुम बिच रास्ते से अपनी पूंछ को हटाओ और मुझे आगे जाने दो"


तब वानर (हनुमान) ने कहा की  "हे महानुभव , तुम मुझे देख सकते हो की मैं कितना कमजोर और बूढ़ा हूँ , मुझमे तो हिलने मात्र की हिम्मत नहीं है , अगर मैं हिलता भी हूँ तो कप-कपाहट से हिलता हूँ। तुम मुझे लांघ कर आगे निकल जाओ "

यह सुनकर भीम कहने लगे की "मैं बलवान हूँ और मुझ जैसे बलवान को किसी को लांघ कर निकल जाना शोभा नहीं देता , तुम खुद ही क्यों नहीं हैट जाते। "

इसका उत्तर देते हुए हनुमान जी कहने लगे की  " मैं बहुत कमजोर सा वानर हूँ, हिल नहीं सकता हूँ। क्यों न तुम खुद ही मेरी तुच्छ सी पूंछ को हटाकर आगे निकल जाओ  "

यह सुन कर भीम कुछ सोचने लगे की मैं तो बहुत बलवान हूँ , सौ हाथियों के बराबर मुझमे बल है। कई बड़े बड़े वृक्षों को मेने उखाड फेंक दिया है तो ये पूंछ क्या चीज़ है। 

भीम ने वानर से कहा की "क्या तुम जानते हो की मैं वायु पुत्र हूँ, मुझमे सौ हाथियों का बल है।  तुम मेरी दया के पात्र हो वानर, मैं तुम्हारी इस तुच्छ पूँछ को अपने बाये हाथ से हटा के अपना रास्ता बना सकता हूँ। "


यह कहके भीम ने अपनी गदा को विश्राम देकर वानर की पूँछ को अपने बाए हाथ से हटाने की कोशिश करने लगे , लेकिन ये क्या , पूँछ तो बिलकुल भी नहीं हिली। भीम ने अपनी कोशिश जारी रखी और दांये हाथ से पूँछ को हटाने का प्रयत्न करने लगे लेकिन फिर से पूँछ बिलकुल भी ना हिली।  अब क्या था, भीम हार मानने वालो में से नहीं थे , भीम ने अपने दोनों हाथो से वानर की पूँछ को हटाने का प्रयत्न करने लगे लेकिन फिर से हनुमान जी की पूँछ इंच मात्र न हिली। 

भीम पूरी तरह से थक चुके थे और वानर की तरफ गौर से देखने लगे तो बूढ़े वानर रूपी हनुमान मंद मंद मुस्कुरा रहे थे।  

भीम को अब ये बात समझ में आ चूकी थी की हो न हो ये कोई साधारण वानर नहीं है, और भीम उस वानर के चरणों में गिर गए और कहने लगे की मुझे क्षमा कीजिए , मैं आपको पहचान न पाया , आपका मैंने बहुत अपमान किया है , मैं आपसे क्षमा याचना करता हूँ। मेरा आपसे निवेदन है की कृपा करके अपना परिचय दे।

तब वानर ने कहा की मेरा कोई परिचय नहीं है , मैं तो प्रभु श्री राम का भक्त हूँ और अभी भी उनकी ही आज्ञा का पालन कर रहा हूँ।  तुम वायु पुत्र भीम हो ये मैं जानता हूँ, लेकिन मैं भी पवन पुत्र हनुमान हूँ इस तरीके से मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूँ।

भीम को प्रभु श्री राम और हनुमान जी गाथा याद आ गई की कैसे हनुमानजी ने अपने विशालकाय शरीर से एक बड़े समुद्र को लांघा था।  

भीम हनुमानजी से निवेदन करने लगे की "है भ्राता , मेरा आपसे निवेदन है की मुझे अपने असली रूप के दर्शन दीजिए "

जब हनुमान जी अपने असली रूप में आये तो सौ हाथियों के बल वाले भीम के आश्चर्य की कोई सीमा नहीं थी क्योकि हनुमान जी के चरण तो दिख रहे थे किन्तु उनका सर आकाश को छू रहा था। 

यह देख हनुमान जी ने कहा की  " मुझे पता है की तुम मुझे पूरा नहीं देख पा रहे हो और  प्रभु श्री राम की कृपा से मैं इससे भी कई गुना अपने शरीर को बड़ा सकता हूँ,  है भीम मैं तुमसे बस इतना ही कहना चाहूंगा की अपनी शक्ति का कभी दुरूपयोग नहीं करना , अपने से कम बलवान को कभी हानि नहीं पंहुचाना, क्योकि ये शरीर, शक्ति और आत्मा सब परमात्मा का दिया हुआ है , तो इस पर कैसा घमंड करना।" 


भीम ने हनुमान जी से क्षमा याचना करते हुए कहा "मुझे माफ़ कीजिए , मैं अभिमान में बहुत चूर हो गया था।  अब से किसी का अपमान नहीं करूँगा।  मुझे माफ़ करो भ्राता और मुझे आशीर्वाद दीजिए ताकि हम पांच पांडव अपने कार्य में सफल हो सके। 

शिक्षा  :- इस पौराणिक कथा से हमें ये शिक्षा मिलती है की इंसान को कभी भी अपनी प्रतिष्ठा, धन, दौलत और रुतबे का घमंड नहीं करना चाहिए।  क्योकि ये सब चीजे नश्वर है।  प्रभु में आस्था रखकर केवल अपना कर्म करते चले जाए।

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NOTE :- This Story is in Hindi Language and I researched a lot and tried my Best to write this Article but in case if you find any grammatical mistakes , you can comment below down. Please Cooperate with us, Keep Supporting and Keep Reading.

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